Subscribe by Email

लोहिया के शिष्यों की औकात नहीं कि उनका सही मूल्यांकन करें


इस देश में गुरू-शिष्य परंपरा रही है। महान गुरुओं से सैकड़ों-हज़ारों शिष्य बाज़ार में घूम रहे हैं। ऐसे ही महान गुरुओं में एक हैं राम मनोहर लोहिया। बीते तीन दशक में उनके शिष्यों को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के जितने मौके मिले उतने कम ही लोगों को मिले होंगे। कुछ ने तो लोहिया को एक ब्रांड की तरह पेश करके बेचने की कोशिश भी की। लेकिन यह भी एक बहुत बड़ा सत्य है कि लोहिया के विचारधारा को उनके इन स्वघोषित शिष्यों ने जितना नुकसान पहुंचाया है उतना शायद ही किसी ने पहुंचाया हो। इसी संदर्भ में युवा पत्रकार सुशांत झा का यह लेख काफी प्रासंगिक है। उनका कहना है कि लोहिया का सही मूल्यांकन अभी तक नहीं हुआ है और सही मूल्यांकन करने की हिम्मत और ईमानदारी उनके शिष्यों में नहीं है। – मॉडरेटर

गैर-कांग्रेसवाद के प्रतीक लोहिया ने जब पंडित नेहरु के खिलाफ फूलपुर से चुनाव लड़ा था तो कईयों ने इसे एक दुस्साहस माना था। बतौर प्रधानमंत्री नेहरु ने घोषणा की थी कि वे पूरे मुल्क के नेता हैं और वे वार-वार चुनाव प्रचार के लिए फूलपुर नहीं आ सकते-ये फूलपुर की जनता का कर्तव्य है कि वो इसे जिताए। लोहिया ने जब वहां से पर्चा भरा तो नेहरु चिंता में पड़ गए। नेहरु ने लगभग तीन बार फूलपुर में प्रचार किया और कम अंतर से वो चुनाव जीत पाए। लोहिया ने कहा- चट्टान टूटा तो नहीं है, लेकिन उसमें दरार जरुर पड़ गया है। साल 1963 में जब वे फार्रुखाबाद से उपचुनाव जीतकर आए तो संसद में उनका आना एक बड़ी घटना बन गया।

वैसे लोहिया अकेले ही संसद से बाहर रहते हुए भी सौ-एमपी के बराबर थे। लोहिया ने सरकार के उस दावे की धज्जी उड़ाकर रख दी थी जिसमें सरकार ने कहा था देश की जनता की औसत आमदनी 15 आना तक पहुंच गई है। लोहिया ने अपने नाई का हवाला देते हुए साबित किया कि देश की जनता 3 आने प्रतिदिन पर गुजारा करती है। उस जमाने में ‘तीन आना बनाम 13′ आना की एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी और इसकी काफी चर्चा हुई थी।

चीन द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाने पर जब पूरी दुनिया को सांप सूंघ गया था और भारत के नेतागण दबी हुई आवाज में प्रतिक्रयाएं दे रहे थे तो लोहिया का बोल्ड स्टेटमेंट था- ये किसी एशिय़ाई मुल्क का पश्चिम की गाल पर पहला तमाचा है। अखबारों में लोहिया का बयान पहली खबर बना, भारत के प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया नहीं। लोहिया ने साम्प्रदायिकता, आरक्षण, महिलाओं की स्थिति,जातिवाद, हिंदी आदि तमाम विषयों पर साफ रुख सामने रखा। उस रुख में न तो कांग्रेस जैसी यथा-स्थिति के पोषण की बात थी न ही बीजेपी (तत्कालीन जनसंघ) जैसी उग्र साम्प्रदायिकता।

कई लोग लोहिया को इस बात के लिए दोषी ठहराते हैं कि उन्हीं की वजह से जनसंघ को मुख्यधारा की राजनीति में जगह मिल गई और साल 1967 की पहली संविद सरकारों में ( 10 राज्यों में) उसे भागीदारी करने का मौका मिल गया उन्हे ये जान लेना चाहिए कि ये लोहिया ही थे जिनका सेकुरिज्म पर एक स्पष्ट चिंतन था। एक साफ सोच थी। लोहिया ये मानते थे कि धर्म के आधार पर मुल्क के बंटवारे के बाद वहुसंख्यक हिंदू जनता को साम्प्रदायिक बताया जाना कांग्रेस की खतरनाक राजनीति है जिसका खामियाजा इस मुल्क को उठाना पड़ेगा। वो हिंदू मुस्लिम एकता के समर्थक थे- न कि कांग्रेस के भयदोहन की राजनीति के-जो आजतक किसी न किसी रुप में जारी है। वे अयोध्या-काशी-मथुरा आदि विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे के पक्षधर थे-जबकि कांग्रेस के नेताओं की आजतक इस बारे में कोई स्पष्ट राय नहीं है।

लोहिया, हिंदू-मुस्लिम एकता के कितने बड़े पक्षधर थे इसे इस बात से समझा जा सकता है कि अभीतक के हिंदुस्तान में गांधी के बाद सिर्फ लोहिया ही हुए हैं जिन्होंने दोनों देशों के संघ की बात की। ये बात अलग है कि इसे भी संघ के ‘अखंड-भारत के सपने’ के अनुरुप बताने की साजिश रची गई। लोहिया की कई दूसरी बातें भी लोगों को संघ के नजदीक लगती गई-मसलन, रामायण मेला, और यूनिफोर्म सिविल कोड पर लोहिया की राय। दुर्भाग्य से लोहिया के मौजूदा नामलेवाओं में इतनी योग्यता, हिम्मत और ताकत नहीं बची है कि वो लोहिया की बातों को सही तरीके से आगे बढ़ा पाएं। हो सकता है कि एक दिन ऐसा आए जब संघ की प्रोपगंडा मशीनरी लोहिया की बातो को भी हाईजेक कर ले।

लोहिया ने पिछड़ा आरक्षण पर अपनी बेवाक राय रखी थी और सौ में पावे पिछड़ा साठ का नारा दिया था। शायद मौजूदा आरक्षण के शोरगुल में लोहिया के नामलेवा उनका नाम तक लेना पसंद नहीं करते-क्योंकि 3 आना बनाम 15 आना के नेता को अब उन्हें अपना नेता मानने में शर्म आती हो।

लोहिया अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले एक चुनावी सभा के सिलसले मेरे जिला मधुबनी आए थे। पिताजी उस वक्त कॉलेज में थे। लोहिया ने चीन युद्ध के बाद की परिस्थितियों पर भाषण देते हुए कहा कि, “नेहरु कहते हैं कि चीन से लड़ो। चीन से कैसे लड़ोगे- वो हमसे 3 गुणा ज्यादा स्टील, 2 गुणा ज्यादा बिजली और 2 गुणा ज्यादा अनाज पैदा करता है। इसके अलावा चीन के लोग तमाम तरह के जानवरों का मांस भी खाते हैं जिसे हम अखाद्य समझते हैं। इसका मतलब है कि चीन की सरकार हमारी सरकार से बेहतर अपनी जनता को पाल रही है।”

सुशांत झा

सुशांत झा

लोहिया ने आगे कहा,”सीमा का मतलब समझते हो? बेचन पांडे और रामू पांडे की जमीन है, तो बीच की मेड़ उसकी सीमा है। लेकिन मेड़ के लिए वही लड़ेगा जिसके पास खेत हो। आज हमारे देश की लाखों की सेना सीमा पर लड़ रही है लेकिन उसके गांव में उसके पास अपनी ही जमीन नहीं है। वो मुल्क की सीमा की रखवाली कितने बेमन से कर रही होगी। पहले ये तय करो कि जो मुल्क के लिए जान गंवा रहे हैं वे किसके लिए जान गंवा रहे हैं?” लोहिया ने कहा कि, “ये याद रखना कि जब मुल्क पर बड़ा संकट आएगा, तो ये तमाम पैसे वाले लोग रातो-रात अपनी बोरिया-विस्तर समेट कर लंदन, न्यूयार्क और पेरिस शिफ्ट हो जाएंगे।”

लोहिया हिंदुस्तान के उन नेताओं में थे जिनका सही मूल्यांकन अभी तक शेष है। सुभाष बाबू, डॉ अंबेडकर और मुंशी प्रेमचंद का मूल्यांकन भी काफी देर से हुआ था। शायद इंटरनेट के इस युग में लोहिया पर कुछ अच्छा काम हो और उसे प्रकाश में लाया जाए।

Share This Post

3 Responses to लोहिया के शिष्यों की औकात नहीं कि उनका सही मूल्यांकन करें

  1. विनीत कुमार Reply

    March 24, 2010 at 12:00 am

    औकात तो शिष्य बनने की भी नहीं थी।..

  2. Neeraj Bhushan Reply

    March 26, 2010 at 11:01 pm

    लोहिया पर तो एक सीरीज चलायी जा सकती है. क्या ख्याल है?

    • Samrendra Reply

      March 26, 2010 at 11:19 pm

      नीरज जी, चलाना चाहिए। नए सिरे से समझने की कोशिश होनी चाहिए। वर्तमान दौर के हिसाब से विश्लेषण होना चाहिए। दरअसल, जिस तरह कांग्रेसियों ने गांधी के साथ विश्वासघात किया, कम्युनिस्ट सरकारों ने मार्क्स और लेनिन को दगा दिया, ठीक उन्हीं की तरह लोहिया के शिष्यों ने भी अपने गुरू को धोखा दिया है। सियासी खोखलेपन और भ्रष्टाचार पर अगर सीरीज चलाई जाए तो उससे बढ़िया क्या होगा? लेकिन यह कैसे किया जाए इस पर विचार करना चाहिए। सीरीज़ कैसे चलाई जानी चाहिए – इस पर भी आप कुछ सुझाव दें। हमें आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>