राम को बचपन से ही भगवान के रूप में ही जाना। बाप-दादाओं की मानें तो मैं राम का ही वंशज हूं। “सूर्यवंशी क्षत्रिय, निकुंभ राजपूत, वशिष्ठ गोत्र और वंश शत्रुघ्न” – ये मेरी जातिगत और धार्मिक पहचान है। इसका कोई दस्तावेज़ तो नहीं है, लेकिन सदियों और पीढ़ियों से मेरे खानदान में इन्हीं प्रतीकों के ज़रिये शादी-ब्याह, मुंडन-कनछेदन, जनेऊ, श्राद्ध-तर्पण और पिंडदान वगैरह होते हैं। साफ कर दूँ कि इन संस्कारों से बंधा हुआ मैं एक आस्तिक व्यक्ति हूं। हिन्दू होने का मुझे उतना ही गर्व भी है, जितना कि हो सकता है। लेकिन मैं अपने पुरखे राम को समालोचना से देखना चाहता हूं। उनके प्रति आदर और श्रद्धा को कम किये बगैर। किसी की भावना को चोट पहुंचाए बगैर।
राम के बारे में सबसे अच्छी बात ये है कि उनका काफी इतिहास हमें पता है। ऋषि बाल्मीकि इतिहासकार भी हैं। राम के समकालीन थे। राम के बेटों लव और कुश का जन्म भी बाल्मीकि आश्रम में ही हुआ था। बाल्मीकि अपने वक्त के शानदार ज्योतिषी भी थे। उनके दौर में भी ज्योतिष इतना विकसित हो चुका था कि उसे आज के नियमों से भी सही पाया गया है। बाल्मीकि के बताये ग्रह-नक्षत्रों की दशा की आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या से ये साफ हो चुका है कि राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को दिन में 12.30 बजे हुआ था। भारतीय कैलेंडर के मुताबिक, यही चैत्र का वो नौवां दिन था, जिसे हम आज रामनवमी कहते हैं। यानी इस बार हमने राम की 7124 वीं सालगिरह मनायी है।
रामकथा के तमाम धार्मिक वर्णन से, और खासकर रामलीलाओं के मंचन की संस्कृति से हम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के बारे में खूब जानते हैं। राम आज्ञाकारी पुत्र थे। भाईयों के लिए आदर्श थे। वैसे तीनों भाई भी उनसे कम सदाचारी नहीं थे। राम ऐसे राजा बने जिनके लिए प्रजा का सुख सबसे बड़ी बात थी। इन बातों को स्वीकार करने में शायद ही किसी को आपत्ति हो। लेकिन हमारे बुज़ुर्गों ने हमें जिस ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के दिग्दर्शन कराए, उनके कुछ आचरण तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं।
मैं ये मानने को तैयार हूं कि राम में कुछ अलौकिक शक्तियां रही होंगी। 12 साल की उम्र में विश्वामित्र उन्हें ‘श्रेष्ठ सैन्य प्रशिक्षण’ देने के लिए अपने साथ ले गये। राम मेधावी और पराक्रमी थे। कम वक्त में, ज़्यादा कुशलता से उन्होंने वो सब कुछ सीखा जो तत्कालीन क्षत्रिय धर्म के लिए ज़रूरी था। इस ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने कई आसुरी ताकतों को नष्ट किया, जो ऋषि के धार्मिक काम में अड़चन डाल रहे थे। अहिल्या उद्धार के रूप में राम का पहला और फिर धनुष यज्ञ के रूप में अगला चमत्कार सामने आया। बाकी असुर बध तो उन्होंने पराक्रमी इंसान के रूप में किये थे। तेरह साल की उम्र में जनक नंदनी से उनका विवाह हुआ। शादी के बाद राम और सीता ने 12 साल अयोध्या में बिताये। राजा दशरथ ने राम के 25वें जन्मदिन से एक दिन पहले यानी 4 जनवरी 5089 ईसा पूर्व का वक्त उनके राजतिलक के लिए तय किया था।
ठीक 25वीं सालगिरह वाले दिन यानी 5 जनवरी 5089 ईसा पूर्व को वो 14 साल के वनवास पर गये। इसके छह दिन बाद यानी 10 और 11 जनवरी 5089 ईसा पूर्व की रात में दशरथ का निधन हुआ। सूर्पनखा के प्रसंग के बाद राम ने उसके भाई खर का वध 7 अक्टूबर 5077 ईसा पूर्व को किया। उस दिन सूर्य ग्रहण था। इसके करीब ढ़ाई महीने बाद 20 दिसम्बर 5077 ईसा पूर्व को रावण ने सीताहरण किया। सीताहरण वनवास के 13वें साल के आखिर में हुआ।
ये कहानी कौन नहीं जानता। इनमें सिर्फ तारीखें रोचक लग सकती हैं। लेकिन मैं तो सूर्पनखा के प्रसंग से राम के व्यक्तित्व को परखना चाहता हूं। राम के ज़रिये सू्र्पनखा को जो सज़ा दी गयी, वो बेहद अमानवीय थी। मर्यादाहीन थी। माना कि सूर्पनखा मायावी थी। लेकिन अगर राम का ‘चमक्तारी व्यक्तित्व’ उसे पहचान चुका था, तो फिर उसके साथ छिछोरी हरकत क्यों की गयीं? उसे कभी लक्ष्मण के पास भेजा जाता तो कभी राम के पास। वो राम की दूसरी पत्नी या फिर लक्ष्मण की पहली पत्नी बनने ख्वाहिश को लेकर ही तो ज़िद कर रही थी। लक्ष्मण उससे कहते हैं कि मैं तो भैया का सेवक हूं। मैं वही करूंगा जो भैया कहेंगे। भैया राम कहते हैं, मैं शादी नहीं करना चाहता। मेरी तो पत्नी भी साथ है। अलबत्ता, लक्ष्मण के बारे में तुम उसी से पूछो। जबकि राम अच्छी तरह जानते थे कि लक्ष्मण भी शादी-शुदा हैं। जनकपुर में एक ही दिन चारों भाईयों की शादी हुई थी। फिर भी सूर्पनखा से मसखरी जारी रही। अंत में सूर्पनखा ने सीता से बद्तमीज़ी की। उन पर हमला करने की कोशिश की। सीता जी बुरी तरह से डर गयीं। इससे राम को काफी गुस्सा आ गया।
राम ने लक्ष्मण को सूर्पनखा को सज़ा देने को कहा। नाक-कान काट देने की सज़ा! एक स्त्री का नाक-कान काटने की सज़ा कितनी वीभत्स और मर्यादाहीन थी। ये आज के ज़माने में किसी महिला पर एसिड फेंक देने से भी ज़्यादा घिनौना था। किसी महिला से थाने में होने वाले सामूहिक बलात्कार जैसा शर्मनाक। ज़रा सोचिए! आज अगर किसी महिला से साथ नाक-कान काटने की हरक़त सामने आए तो क्या होगा… मीडिया कैसा कोहराम मचाएगा… थाना, पुलिस और राजनीति में कैसे-कैसे गुल खिलेंगे… राम की क्या-क्या छीछालेदर होगी… कैसे उन्हें फ़ौरन गिरफ़्तार करने की मांग उठेगी… कौन राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ मानना चाहेगा!
‘त्रेता’ में नारी के प्रति ऐसा बर्ताव उस ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के इशारे पर होता है, जिसने जनकपुर में ही बहुपत्नीवाद के खिलाफ अलख जगाई थी। सीता को वचन दिया था कि ‘रघुकुल रीति’ के विपरीत उनकी आजन्म एक ही पत्नी होगी। ये सुधारवादी क़दम था। लेकिन नाक-कान भंग करने का आदेश कितना अतिवादी था… इससे तो अच्छा होता कि सूर्पनखा को सज़ा-ए-मौत दी जाती। आज किसी की बहन के साथ वैसा सलूक हो तो किस भाई का खून नहीं खौलेगा… कौन भाई, बहन की बतायी कहानी पर, काफी हद्द तक ही सही, यकीन नहीं करेगा… ये मानते हुए भी कि कुछ ना कुछ गलती बहन की भी रही होगी, सूर्पनखा के भाई कैसे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते… आगे जो हुआ, सबको पता है।
इस देश में सैकड़ों-हजारों लोगों की जान इसलिए ले ली गयी कि उन्होंने अपने गोत्र की परवाह नहीं की। यहां सम्मान के नाम पर मरने-मारने का चलन काफी पहले से रहा है। “ऑनर किलिंग” के नाम पर लोग बेहद करीबी रिश्तेदारों की हत्या कर देते हैं। और उसी “ऑनर” के नाम पर बड़े-बड़े युद्ध भी हुए हैं।
‘रामराज्य’ में भी सूर्पनखा को सही सज़ा नहीं मिली। चींटी मारने के लिए तोप चलाई गयी। राम के आचरण में खोट नहीं दिखा, क्योंकि वो भगवान थे। भगवान से तो गलती हो नहीं सकती। जबकि सच तो ये है कि हमारी धार्मिक क़िताबें भगवानों की तमाम गलतियों से भरी पड़ी हैं। सहज तर्क के मुताबिक, सूर्पनखा के प्रसंग में ‘राम का इंसाफ़’ अशोभनीय और निंदनीय रहा। आत्मरक्षा के नाम पर सूर्पनखा की हत्या भी हुई होती तो शायद एक बार को उसे सही ठहराया जा सकता था। लेकिन नाक-कान काट देना तो तालिबानी हैवानियत जैसा है। ये राम का घटिया न्याय था।
सूर्पनखा को दी सज़ा के करीब छह महीने बाद, 3 अप्रैल 5076 ईसा पूर्व को राम का एक और घटिया इंसाफ़ इतिहास में दर्ज़ हुआ। ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ ने छल-कपट की विचित्र मिसाल बनायी। वानरराज बालि का वध किया। धर्म की ख़ातिर बालि वध सही था। लेकिन तरीका फर्ज़ी मुठभेड़ जैसा था। ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ भी फर्ज़ी मुठभेड़ करें, कितना अटपटा है ना! छोटे भाई की पत्नी का यौन शोषण बेशक घिनौना पाप है। लेकिन ऐसे पापी को राम जैसे ‘पराक्रमी भगवान’ ने छल से क्यों मारा… सीधी कार्रवाई में क्या डर था… वैसे बालि था तो बड़ा बलशाली… रावण को भी काँख में दबाकर घूम चुका था।
‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ को तो बालि से साफ कहना चाहिए था कि तुम्हारा अपराध अक्षम्य है… मैं तुम्हें मौत की सज़ा दूंगा… दोस्त सुग्रीव की मदद के नाम पर भी वो खुल्लमखुल्ला ऐसा कर सकते थे। लेकिन छिपकर हमला करके उन्होंने क्या मिसाल पैदा की! इससे तो ‘भगवान’ का ही गौरव फीका हुआ। इस प्रसंग में राम ने सुग्रीव की पत्नी के शील-स्वभाव पर कोई अंगुली क्यों नहीं उठायी? मज़बूरी में ही सही वो बालि को स्वीकार करके उसके महल में जीती रही। वो तो निष्कलंक मानी गयी, लेकिन सीता के लिए दूसरा ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ अपनाया गया।
सीता को लंका में रहते दस महीने बीत चुके थे। 12 सितम्बर 5076 ईसा पूर्व को हनुमान उन्हें ढूंढ़ते हुए अशोक वाटिका पहुंचे। अगले दिन लंका दहन हुआ। एक दिन बाद 14 सितम्बर को सुबह 6.30 बजे हनुमान का लंका से किष्किन्धा की वापसी का सफ़र शुरू हुआ। हनुमान को मौजूदा कर्नाटक के हम्पी इलाके में रह रहे राम तक पहुंचने में छह दिन लगे। वहां से 19 सितम्बर 5076 ईसा पूर्व को दोपहर में राम की सेना ने लंका की ओर कूच किया। इसके 24 दिन बाद पूर्णिमा के दिन 12 अक्टूबर 5076 ईसा पूर्व को राम की सेना ने लंका में रावण के सुवेल महल के बाहर पड़ाव डाल दिया।
लंका में करीब एक महीने तक युद्ध चला। 23 नवम्बर को मेघनाथ मारा गया। इसके 12 दिन बाद 4 दिसम्बर 5076 ईसा पूर्व को राम ने रावण का वध किया। इसी दिन राम ने नारी जाति का सबसे बड़ा अपमान किया। रावण वध के बाद लक्ष्मण को सीता को लेकर आने के लिए अशोक वाटिका भेजा गया। सीता को स्वीकार करने से पहले राम ने अग्नि-परीक्षा की शर्त रखी। परीक्षा में सीता पास हुईं। लेकिन इस प्रसंग में ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ ने कितनी घटिया मिसाल पेश की! उस पत्नी की अग्नि परीक्षा ली, जो दस महीने से दूर थी, लेकिन उससे पहले करीब 25 साल साथ बिताये थे। शादी के बाद 12 साल अयोध्या में और सीता हरण से पहले 13 साल वनवास के दौरान।
यही थी त्रेता में नारी की गरिमा! क्या सीता को ये मौका दिया गया कि वो भी राम से अग्नि-परीक्षा देने को कहतीं! इससे भी बड़ा अंधेर तो ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ ने वनवास से अयोध्या लौटने के बाद सीता से किया। मामूली सी काना-फूसी के आधार पर अर्धांगिनी को त्याग दिया। राजमहल से ही नहीं, राज्य की सीमा से भी बाहर करवा दिया। सहज न्याय का नियम भी ये कहता है कि अग्नि-परीक्षा के बाद किसी के कुछ भी कह-सुन देने के आधार पर सीता को प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी तरीके से सज़ा नहीं मिलनी चाहिए थी। पहले के प्रसंगों में जहां लक्ष्मण ने उन्हें गलत फैसले लेने से नहीं रोककर ग़लतियां कीं, वहीं आखिरी वाकये के वक्त तो पूरा परिवार, गुरु, सामंत वगैरह सभी थे। फिर भी अनर्थ होता रहा। सबको सवाल खड़ा करना चाहिए था। आज्ञाकारी होना तो सर्वोत्तम है, लेकिन विवेकहीन होकर नहीं। धर्म और नीति यही है। आज ही नहीं, त्रेता और द्वापर में भी यही विधान था।
बहरहाल, 29 दिसम्बर 5076 ईसा पूर्व को राम के वनवास के 14 साल पूरे हुए। इसी दिन राम इलाहाबाद में भारद्वाज ऋषि के आश्रम पहुंचे थे। अगले दिन 30 दिसम्बर 5076 ईसा पूर्व को अयोध्या के बाहर नंदीग्राम में भरत-मिलाप हुआ। कुलमिलाकर, राम के व्यक्तित्व में सीखने वाली बहुत सी बातें हैं। लेकिन खोट उनमें भी था। उन्होंने भी गलत फैसले किये। इंसान की तरह। सीता पर शक करके उन्होंने ही खासा संताप भी झेला।
मकसद, धर्म और आस्था के प्रति सवाल खड़े करने का नहीं है, बल्कि बात धार्मिक कहानियों के तार्किक मूल्यांकन की है। अपने पुरखे की खूबी और खामी को परखने की है। आस्था इतनी कमज़ोर नहीं हो सकती कि मूल्यांकन से डोल जाए। क्योंकि धर्म की सबसे सटीक और छोटी व्याख्या तो सिर्फ यही है कि ‘परहित सरिस धर्म नहीं कोऊ’ यानी परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं। आस्था के चश्मे से देखें तो यही बात साकार है और निराकार भी। धर्म आचरणहीन नहीं होता। आचरण को परखना तो और आसान है। ‘दूसरों से ऐसा बर्ताव ना करें, जो यदि आपके साथ हो, तो आपको खराब लगे’। अगर हम ये दो बातें जानते हैं तो फिर और कुछ भी जानने की ज़रूरत नहीं। नहीं जानते, तो फिर सारा ज्ञान कूड़ा है।
नोट — राम के जीवन से जुड़ी तारीखों की वैज्ञानिक गणना पुष्कर भटनागर की पुस्तक ‘डेटिंग द इरा ऑफ लार्ड राम’ में की गयी है। इसे रूपा एंड कंपनी, दरियागंज़, दिल्ली ने 2004 में प्रकाशित किया है।
अरविंद शेष
March 27, 2010 at 1:01 pm
बहुत बढ़िया, लेकिन थोड़ा आगे बढ़िए सर…। जैसे शूर्पनखा (सुरूपनखा) “नाक-कान काटे जाने” (आपने ठीक कहा- थाने में बलात्कार करने (जैसा)…) का विश्लेषण किया, उसी तरह शंबूक “वध” (हत्या) प्रकरण भी रोशनी डालिए। इंतजार रहेगा…
Adwitya
March 27, 2010 at 4:24 pm
मुकेश जी, आंकड़ों का खेल तो आपने अच्छा खेला है…लेकिन बालि वध के संदर्भ में कुछ कहना चाहूंगा…जहां तक मुझे याद आ रहा है बालि को एक वरदान मिला था जिससे अगर उसका दुश्मन सामने से उस पर वार करता है तो दुश्मन की आधी शक्ति बालि के पास आ जाती थी..
इसलिए श्रीराम ने छिप कर बालि पर तीर चलाए…
राम कथा को थोड़ा और पढ़ लेते…
हम सब की एक आदत सी बन गई है – चीजों को अपने मुताबिक विश्लेषण करना..
शक्रिया
Ashok Singh
March 27, 2010 at 5:13 pm
Nice one Mukesh Jee. My understanding is that relegion is amatter of faith and not subject to logical analysis. The beleivers just know it. The closest example is we know who our father is because our mother told us, not because it has been proved by paternity test.
मुकेश कुमार सिंह
March 28, 2010 at 1:21 am
जनतंत्र के जिन सुधी पाठकों ने लेख को पढ़ा, सराहा और आलोचना की… उन सभी के प्रति साधुवाद। लेख में मैंने विस्तार से ये साफ करने की कोशिश की है कि इसे लिखने का मकसद आस्था पर सवाल खड़े करना नहीं है, जाने-अनजाने अगर ऐसा हुआ हो तो उसके लिए लेख में ही खूब विनम्रता से क्षमा याचना भी गयी है… अपने पुरखों की समालोचना का संदर्भ ना तो अनायास है और ना ही भारी चिन्तन के बगैर मुमकिन है।
एक सुधी पाठक ने बालि को मिले किसी कथित वरदान का हवाला देकर और पढ़ने की नसीहत ही है… उनकी टिप्पणी सिर-माथे पर। लेकिन सवाल छल-कपट से उसके वध का है। इस तथ्य को भला कैसे नकारा जा सकता है… फिर चाहे बालि कोई वरदानधारी होता या नहीं…
शिव ने मोहनी रूप धरकर भस्मासुर को निपटाया। वो छल नहीं, कौशल था। अपने दिये वरदान से पैदा हुई समस्या से निपटने का कौशल!
हमें हमेशा पूर्वाग्रह और दुराग्रह से ऊपर उठकर सोचने की कोशिश करनी चाहिए। इसमें किसी की मानहानि भी नहीं होनी चाहिए। खोट किसी में भी हो सकता है। भगवान में भी। क्या इसके अलावा कुछ और अभिप्राय हो सकता है मेरे लेख का? खोट का ताल्लुक परिवेश से भी होता है… जो आज अनुचित है, मुमकिन है कल ना रहा हो। परिमार्जन का क्रम इसी को कहते हैं। यही हमारी सभ्यता और संस्कृति की ताकत है। इसीलिए ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ जैसी बातें पैदा हुईं। हिन्दुओं के अलावा और किसी धर्म में ऐसी स्वछंदता कभी नहीं रही कि हम अपने आराध्यों को भी कसौटी पर कस सकें… यही सनातन की आत्मा है… इसीलिए यहां नास्तिक और काफ़िर भी विधर्मी नहीं है… ये गहराई हमें पुरखों और हमारे दार्शनिकों से मिली है… यही अति विलक्षण है… इसी से हम और आप हैं… वर्ना इंसानी चोला तो तालिबानियों का भी है!
जवाहर चौधरी
March 28, 2010 at 10:32 am
मुकेशजी,
कृपया गिल्ट महसूस नहीं करें , आपने बहुत अच्छा विष्लेशण किया है ।
एक शिक्षित और वैज्ञानिक दृष्टि रखने वाले से यही आशा रखता है जमाना ।
अस्था और विश्वास तालाब के पानी की तरह होते हैं और विज्ञान बहते पानी की तरह ।
रामायण में अभी बहुत सी संभावनाएं हैं जिनके बारे में पीढ़ियों को जानना चाहिये ।
बहुत बहुत बधाई ।