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शिक्षा का अधिकार कानून देर से आया, दुरुस्‍त आया


दस-बारह साल की रही होऊंगी जब राजेश हमारे घर काम करने आया था। रांची के पास रातू के आस-पास के किसी गांव का। जहां तक मुझे याद है, उसके मां-बाप नहीं थे। उसकी उम्र भी हमारे जितनी ही रही होगी, लेकिन उससे उम्मीदों बहुत थी। हमारे संयुक्त परिवार के किसी भी सदस्य ने उस “बुतरू” या “छोटू” को आवाज़ दी हो, तो उसका भाग कर आना लाज़िमी थी। पानी देने से लेकर झाड़ू-पोंछा करने तक, सब्ज़ी लाने से लेकर सब्ज़ी काटने तक का काम राजेश का ही था। राजेश को बस शाम का इंतज़ार होता, जब तरकारी बन चुकी होती, आटा गूंथ चुका होता और घर की महिलाएं या तो स्वेटर बुनने में लगती या अपने-अपने बच्चों को कमरों में लिए पढ़ाने के लिए बैठती। हमारी मां भी हम तीनों भाई-बहन को पढ़ाने बिठाती, और साथ में राजेश भी बैठता।

राजेश में हमारे साथ ही बैठे-बैठे क, ख, ग, ए, बी, सी और गिनती सीखी। हमारी किताबों से ही अक्षर जोड़-जोड़कर पढ़ना सीखा और हमारे साथ ही लेख लिखना, अखबार पढ़ना सीखा। लेकिन राजेश स्कूल नहीं जा सका। राजेश खुशकिस्मत था, उसमें लगन थी, इसलिए साक्षर हो सका। लेकिन ऐसे कई राजेश हैं जिन्हें कभी पढ़ने का मौका नहीं मिलता, जो कभी स्कूल नहीं गए। घरों या होटलों या सड़कों-गलियों-प्लेटफॉर्मों पर जिनके बचपन की पहचान बुतरू या छोटू के नाम से ही होती है।

ऐसे में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) का लागू होना उम्मीद की एक किरण लेकर आता है। बिना किसी भेदभाव के देश के एक-एक बच्चे को शिक्षा मिले, इसका वायदा हर सरकार ने किया, हर बजट में इसके लिए फंड तय किए गए। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। तमाम कोशिशों के बावजूद भारत में साक्षरता दर 66% ही है। यानि अभी भी हमारे देश में 40 करोड़ से ज्यादा लोग निरक्षर हैं। 47% साक्षरता दर के साथ शिक्षा के मामले में बिहार सबसे निचली पायदान पर है। हालांकि, ये 2001 के आंकड़े हैं और देखना ये है कि 2011 में होनेवाली अगली जनगणना में नीतीश के साइकिल बांटने का क्या असर साक्षरता दर पर नज़र आता है।

शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 6 साल से लेकर 14 साल तक के बच्चे को स्कूल भेजने का दारोमदार सरकार पर होगा, और सरकार के सामने चुनौतियां भी कम नहीं होंगी। सबसे पहले तो स्कूल नहीं जानेवाले करीब एक करोड़ बच्चों के लिए स्कूल कहां से आएंगे? हर एक किलोमीटर पर एक स्कूल होने का सपना भी फिलहाल असंभव लगता है। हमारे देश में 12 से 14 साल की लड़कियां शौचालयों के अभाव में स्कूल जाना छोड़ देती हैं। 2009 की रिलीज़ हुई वार्षिक शिक्षा रिपोर्ट (Annual Status of Education Report) के मुताबिक देश के 583 ज़िलों में से 575 ज़िलों के सरकारी और निजी स्कूलों का सर्वे किया गया। इन स्कूलों में सिर्फ 50 फीसदी ऐसे स्कूल थे जिनमें शौचालय थे। लेकिन 10 सरकारी स्कूलों में से 4 स्कूल ऐसे थे जिसमें लड़कियों के लिए शौचालय नहीं थे। जहां थे भी, वहां या तो बंद पड़े थे, या ऐसी हालत में थे कि उनका इस्तेमाल असंभव था।

पिछले साल एक फिल्म की शूटिंग के दौरान हम झारखंड के खूंटी ज़िले के कई गांवों में गए। ज्यादातर गांवों में स्कूल के नाम पर जो भवन था वो ऐसी जर्जर हालत में था कि एक बारिश के बाद उसका खड़ा होना नामुमकिन लगता। प्राथमिक स्कूल की पहली कक्षा से लेकर पांचवीं कक्षा के लिए कमरा एक, और कई बार पढ़ानेवाला भी एक! शिक्षा का स्तर क्या होगा, ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। यहां भी मुझे एक राष्ट्रीय चैनल पर दिखाई एक रिपोर्ट याद आती है जिसमें छात्रों और उनके शिक्षकों को ये नहीं मालूम था कि देश आज़ाद कब हुआ था!

यानि एक बड़ी चुनौती शिक्षकों को चुनना और चुने हुए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना भी होगी। जिस देश में बेरोज़गार आबादी साढ़े चार करोड़ हो और स्नातक बेरोज़गार पचास लाख (2001 जनगणना के मुताबिक), वहां अगली पीढ़ी को तैयार करने के लिए कैसे शिक्षक मिलेंगे, ये खुद ही सोच लें। लेकिन इस भीड़ में से भी शिक्षकों को चुनना और तैयार करना ही इकलौता रास्ता है, क्योंकि जबतक शिक्षक स्वयं प्रेरित ना हो, वो स्कूल आनेवाले बच्चों को शिक्षा हासिल करने की प्रेरणा नहीं दे सकता।

ये पढ़कर तसल्ली मिली है कि इस कानून के मुताबिक बिना किसी लिंग या सामाजिक भेदभाव के बच्चों को स्कूलों में दाखिले दिए जाएंगे। निजी स्कूलों में भी समाज के निचले तबके के छात्रों के प्रति कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा, ना उन्हें अलग कक्षाओं में बिठाया जाएगा। हालांकि, ज़मीनी स्तर पर ये कितना लागू हो पाएगा, ये आनेवाला वक्त ही बताएगा।

फिलहाल हर गांव, हर शहर के स्तर पर कुछ ज़रूरी कदम सरकार और प्रशासन को उठाने होंगे। स्कूल के लिए एक छत, पीने का पानी, शौचालय, किताबें और यूनिफॉर्म उपलब्ध कराना सबसे ज़रूरी होगा। अगर हर गली, हर कस्बे में स्कूल नहीं खुल सकता तो कम-से-कम दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाकों में स्कूलों तक पहुंचाने के लिए परिवहन की सुविधा मुहैया करानी होगी।

अनु सिंह चौधरी

अनु सिंह चौधरी

बाकी, इस देश में लोगों के जज़्बे में कोई कमी नहीं। आस-पास देख लीजिए, आपके घरों में काम करनेवाली आया, खेतों में खटनेवाला मज़दूर, राह चलता रेहड़ीवाला – जिससे पूछिए, एक ही ख्वाब देखता है – अपने बच्चों को स्कूल भेजने का। थोड़ी मदद, थोड़ा प्रोत्साहन मिले तो हर बुतरू, हर छोटू स्कूल जाएगा। जो स्कूल जा ना सके, अपनी तरफ से हम उन्हें साक्षर करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं।

((अनु सिंह चौधरी। सुलझी हुई पत्रकार। करीब एक दशक का अनुभव। देश के प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनलों में से एक एनडीटीवी में लंबे समय तक काम। फिलहाल नौकरी छोड़ मीडिया में स्वतंत्र रूप से पैर जमाने की कोशिश में जुटी हैं।))

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