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मुस्लिम विवाह में हिन्दुस्तान इतना दकियानूस क्यों है?

एक पुरानी कहावत है, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। शोएब मलिक और सानिया मिर्जा की होनेवाली शादी में एक नहीं, कई अब्दुल्ला दीवाना हैं। शादी दो व्यक्तियों का व्यक्तिगत मामला है। परदे में छिपी आयशा सिद्दीकी नामक एक महिला का दावा है कि इस मामले से मेरा भी ताल्लुक है, क्योंकि शोएब मेरा शौहर है। हो सकता है, हो। यह जानने में हमारी क्या दिलचस्पी हो सकती है कि इस दंपति के बीच सक्रिय संबंध रहे हैं या नहीं और नहीं रहे हैं तो क्यों। हम यह भी नहीं जानना चाहते कि आयशा अपने शौहर से खुश नहीं थी, तो उसने यह नटखट धागा काट कर अपनी जिंदगी फिर से बसाने की क्यों नहीं सोची। शोएब के व्यवहार और बातों से लगता है कि वह खुशी-खुशी आयशा को तलाक दे देता। उसके अनुसार, यह शादी उसने की जरूर थी, लेकिन इसमें उसके साथ जबरदस्त फरेब हुआ था। ताज्जुब की बात है कि वह इतने दिनों से इस फरेब के साथ रह रहा था। उसने अपनी और से कोई कोशिश नहीं की कि इस जालबट्टे से बाहर निकल आए। मामला सचमुच दिलचस्प है। कोई नहीं जानता कि ऊंट किस करवट बैठेगा।

हमें सचमुच हमदर्दी है तो हम सबकी प्रिय टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा की हलकानी से। उस बेचारी ने सोचा होगा कि वह एक क्लीन स्लेट पर कुछ लिखने जा रही है। लेकिन ऐन मौके पर मामला कुछ और निकला। इधर शादी की तारीख तय हो रही थी, उधर झाड़ियों में एक सांप छिपा बैठा था और तारीख तय होते ही फुंफकारने की तैयारी कर रहा था। शोएब से सानिया की होने जा रही शादी अरेंज्ड मैरेज नहीं है। अपना शौहर उसने खुद खोज निकाला था। कहते हैं, दोनों के बीच कई वर्षों से इश्क चल रहा था। इस दौरान क्या शोएब ने एक बार भी उससे चर्चा न की होगी कि वह एक निकाहनामे पर पहले भी दस्तखत कर चुका है? अगर नहीं, तो उसने सानिया के साथ एक भद्दा मजाक किया था। अगर वह सानिया को बता चुका था कि अपनी भावी पत्नी के चुनाव के दौरान एक महा चक्कर में फंस गया था और सानिया के मन में कोई शक नहीं पैदा हुआ, तो इससे प्यार की ताकत का पता चलता है। सानिया के कान जरा भी नहीं खड़े हुए, क्योंकि प्यार ने उसकी आंखें मूंद दी थीं। इसी ताकत के भरोसे वह सार्वजनिक रूप से अपने भावी शौहर का साथ दे रही है।

मामला सचमुच दिलचस्प है। हर कोण से दिलचस्प। दो औरतें और एक पुरुष। काश कि वे अपने विवाद आपस में ही सुलझा सकते। आखिर सबकी जाती जिंदगी का मामला है। दूसरे को बदनाम करनेवाला क्या खुद भी बदनाम नहीं होता? आयशा का दावा है कि वह गर्भपात भी करवा चुकी है। उसके घरवालों का कहना है कि बच्चा शोएब का ही था और वे इसका मेडिकल सबूत दे सकते हैं। यह जान कर हमारे मन में यह बात क्यों न आए कि उस बच्चे का कसूर क्या था? उसे किस बात की सजा दी गई? अगर वह बच्चा वाकई शोएब का था, तो वह प्यार का तोहफा था। अगर बाद में शोएब ने इस रिश्ते की इज्जत नहीं रखी, तब भी आयशा इस कीमती तोहफे के साथ अपनी जिंदगी गुजार सकती थी। अगर उसने सचमुच गर्भपात का पेचीदा रास्ता चुना, तो जरूर उसका दिल इस रिश्ते से खट्टा हो चुका होगा। शोएब तो मुक्त होना चाहता ही था। फिर इसमें कोई मुश्किल नहीं थी कि दोनों एक-दूसरे से आजाद हो जाते और अपने-अपने रास्ते पर चल देते।

यह भी कम हैरत की बात नहीं है कि आयशा के घरवाले पुलिस के पास गए और उसने उनकी सारी बातों को सच मान कर तफ्तीश शुरू कर दी। उसने आयशा के घरवालों से अपने इलजामात के पक्ष में ठोस सबूत पेश करने के लिए इसरार नहीं किया। शायद उसने आयशा का बयान भी नहीं लिया। उलटे वह शोएब के पीछे पड़ गई। मानो शोएब पाकिस्तानी है, तो जरूर वही गुनाहगार होगा। आयशा और उसके परिवारवाले हिन्दुस्तानी हैं, सो वे झूठ कैसे बोल सकते हैं ? न वे तिल का ताड़ बना सकते हैं, न अपनी ओर से नमक-मिर्च मिला सकते हैं। पाकिस्तान हमारे साथ जो भी करता रहे, हम पाकिस्तान और उसके अवाम के साथ दोस्ती का दम भरते नहीं थकते। लेकिन बिना कुछ भी साबित हुए हैदराबाद पुलिस ने पाकिस्तान के एक मशहूर क्रिकेटर का पासपोर्ट जब्त कर लिया। मानो पासपोर्ट शोएब की जेब में रह गया, तो वह भाग निकलेगा। जिस आदमी पर पुलिस निगाह रखे हुए हो, वह इतनी आसानी से कैसे भाग सकता है? गुपचुप भागने पर तो उसका दोष अपने आप साबित हो जाएगा। उसके बाद वह अपनी भावी पत्नी को क्या मुंह दिखा सकेगा? हैदराबाद पुलिस के लिए शोएब मलिक को इतना कहना क्या काफी नहीं होता कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, आप मेहरबानी करके हिंदुस्तान न छोड़ें? सज्जनता के तकाजों को छोड़ दिया जाए, तो एक पड़ोसी मुल्क के नागरिक के साथ हमें कम से कम गरिमा के साथ तो पेश आना चाहिए। सोचिए, अगर किसी हिन्दुस्तानी नागरिक के साथ पाकिस्तान की जमीन पर ऐसा ही अशिष्ट सलूक हो, तो हमें कैसा लगेगा?

इस सारे हो-हल्ले के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण बात है, उसकी तो कोई चर्चा ही नहीं कर रहा है। पाकिस्तान में एक बीवी रहते हुए दूसरी शादी कर पाना मुश्किल है। सबसे पहले तो मध्यथता बोर्ड के मेंबरान को संतुष्ट करना होगा कि दूसरी शादी क्यों जरूरी हो गई है। फिर पहली बीवी की रजामंदी भी चाहिए।

राजकिशोर

राजकिशोर

दुनिया के ज्यादातर मुस्लिम देशों में इसी तरह की व्यवस्था है। यह कानून मुस्लिम औरतों की कद्र करता है। लेकिन सरहद के इस पार का कानून मुस्लिम मर्द को खुली छूट देता है कि एक बीवी रहते हुए वह तीन और शादियां कर सकता है। यह क्या बात हुई? मुस्लिम विवाह के मामले में हिन्दुस्तान इतना दकियानूस क्यों है? समान सिविल कानून जब लागू होगा तब लागू होगा, अभी तो उन बेड़ियों को तोड़ फेंकिए जो मुस्लिम औरतों की आजादी और आत्मसम्मान को चोट पहुंचा रही हैं।

((राजकिशोर हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और आप उनसे raajkishore@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))

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