मोहल्ला लाइव, यात्रा बुक्स और जनतंत्र के साझा सेमिनार में भिड़े दिग्गज
साहित्य और मीडिया दो ऐसे पड़ोसी देश की तरह हैं जो हमेशा एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। इनकी दुश्मनी पुरानी है। फिर भी साहित्य को मीडिया की जरूरत है। मीडिया को साहित्य की जरूरत है। मशहूर कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने ये बातें मंगलवार को दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में कहीं। मौका था मोहल्ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स की साझेदारी में पहले बहसतलब का। मीडिया में साहित्य की खत्म होती जगह पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हमें एक खास तरह के साहित्य को ही साहित्य मानने की मानसिकता से उबरने की जरूरत है। जिस वक्त ऐसा होने लगेगा इस बहस को एक निष्कर्ष मिलता दिखाई देने लगेगा। उन्होंने अपनी बात को समझाने के लिए एक सस्ता शेर भी पेश किया : पीछे बंधे हैं हाथ, पर शर्त है सफर… किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दो!
वरिष्ठ आलोचक, स्तंभकार और हिंदी के प्राध्यापक सुधीश पचौरी ने तमाम साहित्यकारों को मीडिया माध्यमों में बहने वाली सर्जना की नदी में उतरने की सलाह दी। उन्होंने साफ कहा कि ये तथ्य दरअसल गलत है कि हिंदी साहित्य का प्रसार कम हुआ है। उन्होंने धर्मयुग और सारिका की तुलना में आज के अखबारों के प्रसार का उदाहरण देकर समझाना चाहा कि पहले साहित्य की “रीच” अगर हजारों-लाखों में थी, तो आज करोड़ों में है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश वार के समय मशहूरियत के अपने परम दिनों में धर्मयुग का सर्कुलेशन तीन लाख के पास था। सारिका का सर्कुलेशन 70 हजार से ज्यादा कभी नहीं गया। आज हिंदी में जो अखबार साहित्य का पेज दे रहे हैं, उनके सर्कुलेशन को देखिए तो पता चलेगा कि ये साहित्य को कितने लोगों तक पहुंचा रहे हैं।
सुधीश पचौरी ने कहा कि रामचंद्र शुक्ल की कविता क्या है वाली परिभाषा आज नहीं चलेगी। हर युग में मीडियम बदलता है, तो सवाल भी बदलते हैं। आज साहित्य क्या है? दलितों के लिए साहित्य आत्मकथा है। मार्जिनलाइज्ड के लिए आत्मकथा औजार है। हर युग में मीडियम के बदलने से लिटरेचर के फॉर्मेट बदले हैं। सुधीश पचौरी ने कहा कि जमाना बदल गया, लेकिन हिंदी के आचार्य नहीं बदले। महानता गिर गयी। मेटा नैरेटिव के धुर्रे बिखर गये : मानस ग्रेट है, दलित कहता है कि संशोधन करो, ये ग्रेट नहीं है। यानी मानस की ग्रेटनेस के बावजूद एक बड़ी आबादी को ग्रेट आइडिया की तलाश है।
सुधीश पचौरी ने पर्याप्त हास के साथ गंभीरता से कहा कि ये स्माइलीज का जमाना है। सुई-ब्लेड का जमाना है। कट किया जा सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने साहित्य को कैजुअली न लेने का अनुरोध किया और कहा कि उसके साथ फौरी किस्म का बर्ताव सही नहीं है। संस्कार के खिलाफ है। उन्होंने बताया कि अज्ञेय कहते थे, आत्मकथा अहंकार की चीज है। वे रवीश की उन बातों पर रिएक्ट कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि मीडिया साहित्यकार के पास जाने को तैयार है लेकिन साहित्यकार को भी मीडिया की तरफ दौड़ना चाहिए – मन का संकोच तोड़ना चाहिए। ओम थानवी ने रवीश की इस चुटकी का जवाब दिया कि केदारनाथ सिंह जैसे कवियों को अपनी कविता पंक्तियां ट्विट करनी चाहिए। ओम थानवी ने कहा कि कोई कविता बहुत टाइम में बनती है। शमशेर पूरी कविता लिखने के महीनों बाद भी उसे सार्वजनिक नहीं करते थे। शमशेर को कहां समझा गया था उनके जीवन काल में? आज उनकी जगह साहित्य में शिखर पर है। आज जो नये मीडिया माध्यमों में साहित्य आ रहा है, उसमें शब्दों की किफायत नहीं है। बहुत शब्द इकट्ठा हो रहे हैं और उनकी विश्वसनीयता नहीं है।
ओम थानवी ने कहा कि असल बात ये है कि मीडिया साहित्य को कितनी जगह देता है। संपादक पर बाजार का दबाव है। साहित्यप्रेमी व्यक्ति मीडिया खड़ा नहीं कर सकता है। इंग्लिश में साहित्यकार सब होते हैं। हिंदी में तहजीब है कि कौन बाजारू है, कौन गंभीर है। क्वालिटी और क्वांटिटी का फर्क हमेशा रखना चाहिए।
युवा समाजशास्त्री शीबा असलम फहमी ने कहा कि मीडिया में साहित्य कब पॉपुलर था? मुझे तो साहित्यकारों की गुर्बत की कहानी मालूम है।
वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने कहा कि टीवी सहित तमाम नये मीडिया माध्यमों की फुर्ती के आगे साहित्यकार सुस्त पड़ जाते हैं, इसलिए उन्हें कोई नहीं पूछता। साहित्यकार अभी भी बैलगाड़ी अवस्था में रहता है, जबकि मीडिया माध्यम जेट विमान की तरह सेकेंडों का समयसाक्षी हो गया है। रवीश कुमार ने कहा कि साहित्यकार नये मीडिया माध्यम को शानदार बाइट दे सकते हैं लेकिन उनका बाइट ठहरकर निकलता है और जब तक वे बाइट देने के लिए तैयार होते हैं, तब तक मुद्दा ही छूट कर पीछे जा चुका होता है। रवीश कुमार ने कहा कि साहित्यकारों को मीडिया के साथ सहज होने के लिए अपनी सुस्ती तोड़नी होगी, क्योंकि वे बाकियों से कहीं बेहतर राष्ट्रीय प्रवक्ता हो सकते हैं।
इस पूरी बातचीत के सूत्रधार थे युवा ब्लॉगर विनीत कुमार। कार्यक्रम की रूपरेखा सबसे पहले जनतंत्र डॉट कॉम के संपादक समरेंद्र रखी। शुरुआत में ही मोहल्ला लाइव डॉट कॉम के मॉडरेटर अविनाश ने एक पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन रखा। धन्यवाद ज्ञापन यात्रा बुक्स की नीता गुप्ता ने किया।
मोहल्ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स के इस पहले बहसतलब में राजकिशोर, मदन कश्यप, विकास कुमार झा, अर्चना वर्मा, पंकज सिंह, अरुण महेश्वरी, रविकांत, राकेश कुमार सिंह, दिलीप मंडल, पाणिनी आनंद, हर्षवर्द्धन त्रिपाठी के साथ बड़ी संख्या में लेखक, पत्रकार, प्राध्यापक और छात्र मौजूद थे।
(इस रिपोर्ट के साभार स्रोत : मंच पर बैठे रवीश कुमार के सभी वक्ताओं के लिये गये फुटनोट्स, विस्फोट डॉट कॉम और नुक्कड़ | बहसतलब में पेश किया गया पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन देखें।)
urmila gupta
May 19, 2010 at 3:00 pm
program bahut achcha tha. specialy vineet aur avinash ka prayas sarahniy hai. dono ne bahut achche se program par pakad banaye rakhi. vapsi main ghar jate samay me yahi soch rahi thi k kitni mehnat kr rahe aap log sahitya ko jan jan tk pahuchane k liye.
pr sachivalya se pehle ke red light p maine jo dekha phir main program k bare main aur nhi soch pai. chorahye pr ek gareeb aurat apne tin chote bachcho k sath baithi thi. ek so gya tha, doosre ko thapak rhi thi teesra bachcha baloons bech rha tha. lekin vo sone k liye kilas rha tha pr uski maa ne use phir bhaga diya.
asi situation main samajh nhi ata k kya kiya jaye. aap log jahan itna kuch kr rhe h whi pls in logo k liye kya kuch nhi ho sakta. pls mera network bahut bda nahi hai lekin gr aap log chaye to zaroor kuch kr sakte hai. atleast jo kr skte unka dhyan is aur dilaye. sahitya aur media pet bhare logo ko suhata hai pr bhooke pet walo k liye kya is yuva verg ka dhyaan nhi jayega. pls do somthing for…
सत्य प्रकाश
May 22, 2010 at 2:34 am
वास्तव में लेखक एक बेहतर राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अन्तराष्ट्रीय प्रवक्ता हो सकते हैं .आपके द्वारा आयोजित सेमीनार में बहुत सारे छोटे बड़े लेखकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और बहस में हिस्सा लिया .सेमीनार के पांच प्रमुख वक्तावों में एक महिला लेखिका थीं शीबा असलम फ़हमी जो हंस में नियमित रूप से लिखती हैं .” मीडिया में साहित्य की ख़त्म होती जगह” सेमीनार में भी उन्होंने अपने विचार वयक्त करते समय अपनी धार को और तेज़ रखा। बहेलियों से लेकर मीडिया के लालाओं तक पर सवाल उठाया। हिंदी में भी इस्लाम है और इसका इस्लाम खतरे में है ,रेखांकित किया । किसी साहित्य के प्रोफेसरान से किसी सर्टीफिकेट की कोई जरुरत नहीं है, कहकर ,युवा और नए लिखने वालों का उत्साह बढ़ाया,एक डर ख़त्म किया और एक बोझ से मुक्ति की वकालत की । साहित्य मीडिया के लिए कब एक प्रमुख सब्जेक्ट रहा है ,कहकर मीडिया की व्यापारिक लाभ की ओब्जेक्टिविटी साफ़ कर दी । सभी प्रकार के साहित्य ,मीडिया और भाषा की पुनर्व्याख्या की मांग की.कहानी ग़ुरबत की मालूम थी उनको मगर ..ये कहाँ मालूम कि उनकी कही गयी बातों को वो ही लोग अपने अपने वेबसाइट पर सिर्फ दो लाइन ही जगह देंगे जिन्होंने इस सेमीनार का आयोजन किया था .उन्होंने तो साहित्यकारों के ग़ुरबत की बात उठाई थी उनको क्या मालूम की वेब मीडिया भी इतना गरीब होगा। शीबा असलम फ़हमी ने वहाँ खूब तालियाँ बटोरी .बहुत सारे लोग आज भी कह रहे थे मुझे कि वो उनसे बहुत हद तक सहमत थे .तो क्या आप सारे वेब मीडिया संचालक की ये जिम्मेदारी नहीं बनती कि उनकी कही बातों को पूरी तरह से जगह देते और जो उस सेमीनार में नहीं जा सके उन तक भी उनकी पूरी बात पहुंचे