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बहसतलब “दो” में अचानक पहुंचे अनुराग कश्यप

मोहल्‍ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्‍स के आयोजन बहसतलब दो अचानक पहुंच कर फिल्‍म निर्देशक अनुराग कश्‍यप ने सबको चौंका दिया। बात उन्‍हीं से शुरू हुई। अनुराग ने कहा कि सिनेमा एक खर्चीला माध्‍यम है, इसलिए ये बाजार की कैद में है। जिस सिनेमा में आम आदमी की चिंता की जाती है, वह हॉल तक पहुंच ही नहीं पाता। समांतर सिनेमा को सरकार का सपोर्ट था। एनएफडीसी को फिर से खड़ा करने की बात चल रही है, उसके बाद कुछ फिल्‍मों में आम आदमी दिख सकता है। लेकिन अगर इस बार भी दर्शकों ने परदे पर आम आदमी को खारिज कर दिया, तो सिनेमा जैसे माध्‍यमों में आम आदमी की बात बेमानी हो जाएगी।

अनुराग से कई लोगों ने सवाल किये और ज्‍यादातर सवाल ये थे कि सिनेमा में अच्‍छा कंटेंट इतना मुश्किल क्‍यों है और ज्‍यादा पैसों के इनवॉल्‍वमेंट के बरक्‍स क्‍या एक कम पैसों से संभव होने वाले सिनेमा का मॉडल खड़ा हो सकता है। अनुराग ने कई उदाहरणों से इस सवाल के जवा देने की कोशिश की लेकिन अंतत: सिनेमा के प्रदर्शन-प्रसारण की सीमा बताते हुए कहा कि फिलहाल मुश्किल लगता है।

वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि साहित्‍य आम को खास बनाने की विधा है। घीसू और माधव आम आदमी नहीं, प्रेमचंद की कहानी का किरदार होते ही खास आदमी हो गये। साहित्‍य नाम और रूप होता है। कोई भी किरदार जब किसी कृति में आता है, तो वह आम नहीं रह जाता। कलाकार हमेशा विशेष चरित्र रचता है। वाल्‍मीकि के राम और तुलसी के राम एक नहीं हैं।

पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि मीडिया का काम तीन तरह से होता है। एक्टिविज्‍म, रचनात्‍मकता और कैरियर। आज के मीडियाकर्मियों का ओरिएंटेशन दूसरी, तीसरी तरह का है। एक्टिविज्‍म गायब हो गया है। समाज में ही आंदोलन नहीं है। अकेले पत्रका‍रिता को दोष देना ठी नहीं। मीडिया आज पैसे का खेल हो गया है। इसके बावजूद मीडिया धोखा नहीं दे सकता – क्‍योंकि पाठक कभी धोखे में नहीं आता। इंडिया शाइनिंग के झूठ के बावजूद लोगों ने फैसला पलट दिया।

वरिष्‍ठ रंग निर्देशक त्रिपुरारी शर्मा ने कहा कि अभी तक बिजनेस, मार्केटिंग हमारे काम का हिस्‍सा नहीं बन पाया है। ऐसा भी नहीं है कि हम इस तरह से बात करें कि थिएटर यही होता है, ये नहीं होता। आज जितनी भी विधाओं पर हम बात कर रहे हैं, उनमें थिएटर सबसे पुराना है। थिएटर हाशिये के लोगों का ही माध्‍यम रहा है। थिएटर जीवन की कल्‍पना का स्‍पेस है। वह सिर्फ शब्‍द नहीं है। ये संभव है कि आपको एक नाटक देखने के लंबे समय बाद उसके शब्‍द याद न रहें, सिर्फ छवियां याद रहे, ध्‍वनि याद रहे। इसलिए थिएटर पर हम वैसे बात नहीं कर सकते, जिस तरह साहित्‍य और मीडिया पर बात कर सकते हैं।

वरिष्‍ठ फिल्‍म क्रिटिक अजय ब्रह्मात्‍मज ने कहा कि बॉलीवुड में क्रिएटिव कामों की बागडोर हमेशा बंबई के बाहरवालों ने संभाली। बाहर के लोगों ने फिल्‍म इं‍डस्‍ट्री खड़ी की। लेकिन जैसे ही बाहर के लोग इंडस्‍ट्री के मेनस्‍ट्रीम में शामिल हो जाते हैं, उनकी क्रि‍एटिविटी गुम हो जाती है। वो बाजार के हिसाब से फिल्‍में बनाने लगते हैं। पैसा जहां से आ रहा है, वो सिनेमा का सब्‍जेक्‍ट तय कर रहा है।

संचालन युवा मीडिया विश्‍लेषक विनीत कुमार ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत में बहसतलब की मंशा के बारे पेंग्विन इंडिया के संपादक निरुपम ने बताया। मोहल्‍ला लाइव के संपादक अविनाश ने विषय से जुड़ा एक पावर प्‍वाइंट प्रजेंटेशन रखा और आभार वक्‍तव्‍य यात्रा बुक्‍स की संपादक, प्रबंधक नीता गुप्‍ता ने दिया।

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One Response to बहसतलब “दो” में अचानक पहुंचे अनुराग कश्यप

  1. Pingback: EXCLUSIVE: अनुराग की उड़ान के कुछ पुराने पन्ने | जनतंत्र

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