“अगर एक फिल्म में कैटरीना कैफ का पोस्टर हो और दूसरे में किसी दलित या आदिवासी हीरो या हीरोइन का, तो दलित और आदिवासी भी कैटरीना की फिल्म ही दिखेंगे।“
अनुराग कश्यप की इस भोली टिप्पणी को सुनकर इंडिया हैबिटेट सेंटर का कैजुरीना हॉल तालियों से गूंज उठा। अनुराग ने बॉलीवुड की फिल्मों के किरदारों और फिल्मों में काम करने वालों में भारतीय विविधता न होने पर अपना सबसे मजबूत तर्क रख दिया था और नामवर से लेकर राजेंद्र यादव तक लाजवाब थे।
नामवर की चिंता तो यह है कि साहित्य में दलित और स्त्री विमर्श हो रहा है, लेकिन आम आदमी की बात ही नहीं हो रही। नामवर सिंह और यूथ फॉर इक्वैलिटी के लिए आम आदमी की परिभाषा संयोग या दुर्योग से एक ही है। अजय ब्रह्मात्मज ने हिंदी फिल्मों के सामाजिक पक्ष की बात करते हुए कहा कि हिंदी फिल्मों में प्रेमी और प्रेमिकाओं के मुस्लिम नाम नहीं रखे जाते। यह एक महत्वपूर्ण बात है, जिसपर विचार किया जाना चाहिए।
अमेरिकी फिल्मों में ब्लैक कलाकारों और किरदारों के होने और बॉलिवुड फिल्मों में दलितों और आदिवासियों और पिछड़ी जातियों (इनसे मिलकर देश की तीन चौथाई आबादी बनती है) की अनुपस्थिति पर अनुराग कश्यप ने कहा कि दलितों-आदिवासियों से हम भारतीय जितनी नफरत करते हैं, अमेरिका में अश्वेत लोगों से उतनी नफरत नहीं की जाती।
जिस समय हैबिटेट के बेसमेंट के हॉल कैजुरीना में यह बहस चल रही थी, तो हॉल में मौजूद कई लोग चाह रहे थे कि यह चर्चा बंद हो। इस बारे में कोई प्रतिप्रश्न न पूछे जाएं। कैजुरीना में मौजूद लोग दरअसल भारतीय बुद्धिजीवियों के प्रतिनिधि ही तो हैं, जो ऐसे असहज सवालों से बचते आए हैं। ऐसे लोगों का सबसे मजबूत तर्क यह है कि – “क्या फिल्मों में भी कोटा लागू कर दिया जाए।“ वे यह नहीं देख पाते कि फिल्मों में भी भारतीय समाज की वर्चस्ववादी व्यवस्था उसी रूप में काम करती है, जिस तरह से लोकजीवन के दूसरे अंगों में। यकीन न हो तो किसी भी फिल्म पत्रकार से पूछ लें कि फिल्मों में स्टंट करने वाले कलाकार किन जातियों से आते हैं। या यह जानने की कोशिश करें कि राममंदिर आंदोलन के बाद बॉलीवुड में कितनी मुस्लिम अभिनेत्रियां आई हैं और सफल हो पाई हैं। मुस्लिम अभिनेत्रियों को मधुबाला और मीना कुमारी जैसे नाम क्यों रखने पड़े?
अनुराग जब कैटरीना का उदाहरण दे रहे हैं तो वे भूलते हैं कि अमेरिका में भी अश्वेतों के मानवाधिकार आंदोलनों को जब तक एक मुकाम नहीं मिल गया और लोकजीवन में अश्वेतों को जगह नहीं मिली थी, तब तक वहां भी अश्वेतों को इसी तरह असुंदर या प्रतिभाहीन माना जाता था। लेकिन आज एक अमेरिकी अश्वेत कलाकार विल स्मिथ दुनिया का सबसे महंगा फिल्म अभिनेता है और टेलीविजन की सबसे महंगी प्रेजेंटर का नाम ओपरा विनफ्रे है। अमेरिका में श्वेत वोटों के बड़े हिस्से के समर्थन की वजह से एक अश्वेत राष्ट्रपति चुना जाता है। वह देश सचमुच अश्वेतों के प्रति कम निष्ठुर है।
दक्षिण अफ्रीका में भी नस्लवाद की समाप्ति के बाद प्रतिभा का जो विस्फोट हुआ और इस वजह से देश ने जिस तरह से तरक्की की, उसके नमूने विश्व कप फुटबॉल के प्रसारण में देखे जा सकते हैं। काले और कथित रूप से प्रतिभाहीन दक्षिण अफ्रीकी लोगों ने एक बेहतर देश बनाकर दिखाया है। उस देश की लगभग सभी कंपनियों को अश्वेत सीईओ पूरी काबिलियत के साथ चला रहे हैं। इसकी तुलना भारत से करें तो कॉमनवेल्थ जैसे अपेक्षाकृत बेहद छोटे आयोजन को करने में देश का दम फूल रहा है। कलमाडी से लेकर श्रीधरण तक, सारे योग्य लोग हांफ रहे हैं। फ्रांस अपनी फुटबॉल टीम का नेतृव अफ्रीकी मूल के जिडान के सौंपने से नहीं हिचकता। दुनिया जन्मगत भेदभाव को मिटाने की कोशिश कर रही है। यह एक लंबी दौड़ है। लेकिन अनुराग की बातों से लगता है कि भारत इस मैराथन में शामिल होने की जगह मैदान के बाहर बैठा है, आत्ममुग्ध है और अपना चेहरा आईने में देख देख कर तालियां बजा रहा है। इसलिए हे अनुराग कश्यपों, इस देश में भी जब प्रतिभा जन्म और जाति की मोहताज नहीं रह जाएगी तो कथित रूप से असुंदर और प्रतिभाहीन समुदायों से भी प्रतिभाएं (जिसे आप कैटरीना कैफ नाम देते हैं) सामने आने लगेंगी। आखिर एक अतिपिछड़ी जाति का चिरंजीवी दक्षिण भारत का सबसे बड़ा स्टार बन ही गया। दक्षिण भारत में सामाजिक समता के आंदोलनों का असर है कि वहां अवर्ण और मझौली जातियों से एनटीआर और ऐश्वर्या राय आदि कलाकार सहजता से पैदा होते हैं। उत्तर भारत में वंचित समुदायों की सामाजिक और आर्थिक हैसियत बेहतर होने के साथ यहां भी विल स्मिथ और ओपरा विनफ्रे पैदा होने लगेंगे। इसके साथ ही जातीय नफरत भी कम होगी। प्रतिभा अवसर के अलावा कुछ नहीं है। अमर्त्य सेन को बचपन में पलामू या मिर्जापुर या कूचबिहार के किसी गांव के स्कूल में पढ़ते हुए सोचिए। प्रतिभा के बारे में सारे भ्रम दूर हो जाएंगे।
जब भारत के हर समुदाय और तबके से प्रतिभाएं सामने आएंगी, तभी यह देश आगे बढ़ सकता है। चंद समुदायों और व्यक्तियों का संसाधनों और प्रतिभा पर जब तक एकाधिकार बना रहेगा, जब तक इस देश में सबसे ज्यादा अंधे रहेंगे, सबसे ज्यादा अशिक्षित रहेंगे, सबसे ज्यादा कुपोषित होंगे और आपकी सोने की चिड़िया का यूएन के वर्ल्ड ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में स्थान 134 वां या ऐसा ही कुछ बना रहेगा।
प्रश्न सिर्फ इस बात का है कि क्या एक सचेत व्यक्ति के तौर पर हम यह सब होते देख पा रहे हैं। या फिर सिर्फ लीक पीटने वाली बातों और तर्कों पर तालियां बजा रहे हैं।
अभिषेक
June 23, 2010 at 12:00 am
बेहद दुराग्रह से लिखा गया एक लेख।