इस मामले में बड़ी गड्डमड्ड स्थिति है। हम सिर्फ स्त्री-पुरुष, विवाहेतर संबंधों में फंसकर रह जाते हैं। देवर-भाभी, बहन सब पर फिल्में बनी हैं लेकिन आज नहीं हैं। मां-बेटे के रिश्ते क्यों नहीं दिखाई देते। देवर-भाभी के संबंध में दिखाई क्यों नहीं देते। लेकिन आज जब भी चर्चा करते हैं तो स्त्री कितनी स्वतंत्र हो गयी है, पुरुष कितना अराजक हो गया। ये बहस सही दिशा में नहीं जाती। गाइड सबसे बड़ी फिल्म है नारी मुक्ति की। ये समाज के अंदर की फिल्म है इसलिए वो अराजक नहीं लगती जितना कि जिस्म की स्वतंत्रता अराजक दिखाई देती है। जहां फिल्मों से संबंध गायब हो गये और प्रवेश को इंग्लैंड जाना पड़ा मिसेज मेहता बनाने के लिए।
परिवार के दिखाने पर रिश्ते अराजक नहीं रह जाते। फिल्मों से सामाजिक नियंत्रण कितना रह गया है, ये बहुत जरूरी मुद्दा है। क्या सामाजिक नियंत्रण नहीं है? अगर नहीं है तो रिश्तों में अराजकता है, क्या उसका हम सम्मान करेंगे।
हम ज्यादा से ज्यादा शरीर देखना चाहते हैं – मृत्युंजय
हमलोग स्त्री-पुरुष संबंध को खास दायरे में संकुचित करके देखते हैं। कई सारे रिश्ते उलझे होते हैं लेकिन आमतौर पर ऐसा बाजार है कि रिश्ते के कुछ खास रूप ही उभारे जाते हैं। सपना बेचता सिनेमा जब कहते हैं तो सपने का बेचना आसान काम नहीं है। हम ज्यादा से ज्यादा शरीर देखना चाहते हैं। ऐसे में जब गुस्सा होना चाहिए लेकिन हम इस लोभ में होते हैं कि शरीर थोड़ा और दिख जाए। इस पर उंगली रखने की जरूरत है। कई बार हम देखते हैं कि जब फिल्म रिलीज होती है तो एक प्रचार शुरू हो जाता है कि इसमें बोल्ड सीन है। ये फिल्म की मार्केटिंग करने का तरीका है। ये जो प्रचार का तरीका है, ये खतरनाक है।
रिश्तों की अराजकता को सम्मान देना जरूरी है, मैं मानता हूं कि होना चाहिए। अगर हम उनसे सुखी होते हैं तो हमें भी उनको ये अधिकार देना चाहिए।
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