♦ शशि शेखर, प्रधान संपादक, हिंदुस्तान ♦
11 सितंबर 2001, उस दिन हरारत थी। सोचा प्राइम टाइम बुलेटिन की योजना तैयार कर जल्दी घर चला चलूं। बाहर निकल रहा था कि अचानक एपीटीएन के मॉनीटर पर अभूतपूर्व दृश्य दिखा। एक जहाज गगनचुंबी बिल्डिंग से टकरा रहा था। मैं चिल्लाया- अरे, देखो ये क्या हो गया। कुछ ही क्षणों में अगला जहाज दूसरे टावर से टकरा रहा था। समझते देर न लगी कि यह हादसा नहीं, हमला है। पैर जैसे जड़ हो गए। अगले कई घंटे बेहद तकलीफदेह दृश्यों से दो-चार होने के थे। टीवी पत्रकारों को दर्शकों से पहले विभीषिकाओं का दीदार करना होता है।
उस दिन अमेरिका को पहली बार आतंकवाद का कड़वा घूंट पीने को मजबूर होना पड़ा था। वहां सारे जहाज रनवे पर खड़े कर दिए गए थे और राष्ट्रपति बुश को सुरक्षा की दृष्टि से अज्ञात स्थान पर ले जाया गया था। हर क्षण सद्दाम हुसैन और दुनिया को धमकाने वाली उनकी आवाज कुछ समय के लिए नदारद थी। अगर फिजां में कुछ तैर रहा था तो सिर्फ गम, गुस्सा और हताशा। पर्ल हार्बर के बरसों बाद अमेरिकियों का ऐसा संहार हुआ था। उस जापानी हमले को नई पीढ़ी ने महज फोटो और फिल्मों में देखा था। 9/11 को मौत ने उन पर सीधा हमला बोला था। वह आक्रमण सिर्फ अमेरिका पर नहीं था। इससे समूची दुनिया के अर्थतंत्र की चूलें हिल गई थीं। तय था कि दुनिया की सीरत अब पहले जैसी नहीं रह पाएगी।
तब तक ओसामा बिन लादेन और उसके ‘अल-कायदा’ को बहुत कम लोग जानते थे। अमेरिका ने उसे भस्मासुर बनाया था। अब उसकी आग उगलती लिप्सा अपने आका को लीलने पर आमादा थी। ओसामा सहित सब जानते थे कि ‘दुनिया का दारोगा’ पलटकर हमला जरूर करेगा। वह गुम हो गया था। विश्व की सबसे बड़ी ताकत के शीर्षस्थ खुफिया अगले 10 साल उसे खोजते रह जाने वाले थे। यह आतंकवाद के वैश्वीकरण की शुरुआत थी। इससे पहले अमेरिका और उसके अलंबरदार दोहरे मापदंड अपनाते थे। उनकी नजर में अफ्रीका और एशिया के लोगों का खून ऐसे पानी की तरह था, जिसके बह जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। पहली बार उनकी धरती उन्हीं का रक्त पी रही थी। दर्द असह्य था और तिलमिलाहट भी। अमेरिका अंतहीन जंग की ओर बढ़ रहा था। अमन-चैन से बसर कर रहे दुनिया के तमाम देश उसकी चपेट में आने वाले थे। मसलन, नार्वे। इस शांत देश के लोगों को अंदाज नहीं था कि उन्हीं के बीच ऐसा शख्स पल रहा है, जो अपने बंधुओं का सिर्फ इसलिए खून करेगा, क्योंकि वे इस्लाम के खिलाफ जेहाद में उसके साथ नहीं हैं। डर है कि ब्रीविक भी मुहम्मद अत्ता की तरह जानलेवा परंपरा का अग्रणी पुरुष न बन जाए।
इस हमले की खरोचें आज भी अमेरिका और इसके नागरिकों के चेहरों पर पढ़ी जा सकती हैं। वाशिंगटन को हर साल संघीय बजट का 20 फीसदी आतंकवाद से निपटने पर खर्च करना पड़ता है। इसमें कॉरपोरेट घरानों और राज्यों के खर्चे शामिल नहीं हैं। इस सारी रकम को मिला दें, तो तमाम एफ्रो-एशियाई देशों में खुशहाली आ जाए। उन दिनों इस महाद्वीप के लोग इतने बौखला गए थे कि वे कत्लेआम पर आमादा हो गए। प्रमुख शहरों की सड़कों पर हर उस नागरिक पर हमले होने लगे, जो शक्ल-ओ-सूरत से अलग नजर आता था। सिखों को भी इससे जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा। इससे पहले संयुक्त राज्य में कभी ऐसा नहीं हुआ था।
जॉर्ज बुश ने इस आक्रमण के तत्काल बाद नई रणनीति की घोषणा की। उन्होंने कहा कि समूची दुनिया के देशों को साफ करना होगा कि वे हमारे साथ हैं अथवा विरोध में। अब तक अमेरिकी अलगाव और आतंक के हमसायों को इमदाद बांटते आए थे। इन पापों के प्रायश्चित के लिए अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया। बगदाद में अपदस्थ सत्ता नायक सद्दाम हुसैन दिसंबर, 2003 में पकड़े गए और उन्हें 30 दिसंबर, 2006 को फांसी पर लटका दिया गया।
मौत की मार्केटिंग में माहिर अमेरिकियों ने एक फोटो ‘लीक’ की, जिसमें जल्लाद को सद्दाम हुसैन के गले में फंदा डालते दिखाया गया था। संदेश साफ था कि जो हमारे साथ नहीं है, उसका यही हश्र होगा। पर ओसामा अभी तक अपनी बनाई खोह में छिपा हुआ था। उसे ढूंढ़कर खत्म करने में पांच साल की मेहनत और बाकी थी। पिछली दो मई को ‘सील’ कमांडोज ने उसे भी मौत के घाट उतार दिया। इससे अमेरिका की कसम तो पूरी हो गई, पर दुनिया में आतंकवाद कहां खत्म हुआ?
पिछले बुधवार को हमने दिल्ली को एक बार फिर अपने खून से लथपथ देखा। चार महीने के दौरान भारत में आतंकवाद की दो प्रमुख वारदातें हो चुकी हैं। यह ठीक है कि अमेरिका अब दहशतगर्दी के मामले में भारत की तुलना अन्य मुल्कों से नहीं करता। वह हमें अपना पार्टनर मानता है। इस पार्टनरशिप की वजह से कूटनीतिज्ञों का फायदा जरूर हुआ, पर ये धमाके गवाह हैं कि हमें इसका नुकसान अभी तक उठाना पड़ रहा है। एक बार फिर हम जाने-अनजाने अमेरिका की द्विअर्थी नीतियों के शिकार हो रहे हैं। मुंबई और दिल्ली के धमाके इसके गवाह हैं। विशेषज्ञों के एक धड़े को शक है कि दिल्ली में ब्लास्ट अल-कायदा ने किया। वजह? जिस पदार्थ का प्रयोग विस्फोट के लिए किया गया, वह अल-कायदा का पसंदीदा रहा है। क्या ओसामा की मौत के बाद अल-कायदा भारत पहुंच गया है? कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। जांच जारी है।
कुछ अमेरिकी समाजशास्त्री 9/11 के हमलों को अपने देश के मानस पर सकारात्मक परिवर्तन करने वाला मानते हैं। उनका दावा है कि इससे अमेरिका में खुलापन आया और 1776 में स्थापित हुए लोकतंत्र में पहली बार किसी अश्वेत के राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ हुआ। हो सकता है यह सही हो, पर इस हमले के दुष्प्रभाव भी सामने हैं। अमेरिका ने आत्मरक्षा और आक्रमणों पर इन दस वर्षों में जितना पैसा खर्च किया है, उससे उसकी ताकतवर रीढ़ की हड्डी चोटिल हो गई है। 2008 में शुरू हुई मंदी पूरी तरह विदा होने से पहले ही वहां वापस लौट चली है। बेरोजगारी और बदहाली हर रोज अपना आकार बढ़ाती जा रही है। 1917 से आर्थिक रेटिंग पर कायम उसकी बादशाहत ध्वस्त हो चुकी है।
लड़खड़ाता हुआ अमेरिका और पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रहे आतंकवादी क्या साबित करते हैं? यही न कि यदि यह महादेश अभी नहीं सुधरा, तो कुछ साल बाद ओसामा के अनुयायी कह सकेंगे कि हमारा नेता सही था। 9/11 को सिर्फ विश्व व्यापार केंद्र के जुड़वां टावर ही नहीं गिरे थे, सबसे शक्तिशाली देश के फिसलने की भी शुरुआत उसी दिन हो गई थी।
इस समय हिन्दुस्तान की भी रूह और जिस्म दहशत भरी करतूतों से घायल है। पर हम उनके मुकाबले इत्मीनान की सांस ले सकते हैं। सदियों पुरानी मुफलिसी के बावजूद हमारा सामाजिक और आर्थिक तानाबाना अमेरिका की तरह बिगड़ नहीं रहा। अफसोस इस बात का है कि गांव बन चली धरती पर यदि वाशिंगटन में लू चलती है, तो उसका ताप पूरी दुनिया को भोगना पड़ता है। हम इसके अपवाद नहीं हैं।
हिंदुस्तान से साभार
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