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बेबाक मीडिया यानी जनतंत्र का मज़बूत स्तंभ। लेकिन वही मीडिया जब सत्ता और पूंजी के खेल में शामिल हो जाता है, तो ख़बरें “मैनेज” और “मैनीपुलेट” होने लगती हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी दम तोड़ने लगती है। जनतंत्र डॉट कॉम का मकसद इस तरह के मामलों को उजागर करना है। प्रेस की आज़ादी के लिए पत्रकारों की बेहतरी एक ज़रूरी शर्त है। इस संदर्भ में इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स की ये राय काबिले गौर है, “जहां पत्रकार भ्रष्टाचार, डर और गरीबी में जी रहे हों, वहां प्रेस की आज़ादी मुमकिन नहीं”। इस नज़रिये को सामने रखते हुए हम पत्रकारों की हालत और मीडिया इंडस्ट्री की दशा-दिशा पर असर डालने वाली हलचलें भी आप तक पहुंचाते रहेंगे।