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कब तक दूसरों की भाषा बोलोगे संदीप?

कब तक दूसरों की भाषा बोलोगे संदीप?

इसका क्या करे कि प्रभाष परंपरा न्यास के सूत्रधारों ने कवच के तौर पर हमारे प्रभाष जी के बड़े बेटे और क्रिकेट के शानदार खिलाड़ी संदीप जोशी को इस्तेमाल किया।…

प्रभाष जोशी को उद्देश्य से ज्यादा उत्सव प्रिय थे

प्रभाष जोशी को उद्देश्य से ज्यादा उत्सव प्रिय थे

प्रभाष जोशी ‘हाइवे’ पर रहते हुए भी पगडंडी के लोग थे। उनको उद्देश्य से ज्यादा उत्सव प्रिय थे। इसलिए न्यास का एक उद्देश्य उत्सव भी है।…

आज जनसत्ता पढ़ कर प्रभाष जी की कमी कुछ कम खली

आज जनसत्ता पढ़ कर प्रभाष जी की कमी कुछ कम खली

मैं जनसत्ता रोज नहीं मंगाता। सिर्फ़ संडे के संडे जनसत्ता पढ़ता हूं। लेकिन प्रभाष जोशी के निधन के बाद जनसत्ता बेरंग, बेरस नज़र आ रहा था। दो पुस्तक समीक्षाएं पहले…

क्या जनसत्ता ने वामपंथ को निपटाने की सुपारी ली है?

क्या जनसत्ता ने वामपंथ को निपटाने की सुपारी ली है?

आज जनसत्ता के पहले पन्ने पर कुल दस ख़बरें हैं जिनमें से चार वामपंथ की अलग-अलग धाराओं से जुड़ी हैं। अख़बार की पहली लीड है – “माओवादियों पर नकेल के…

“जन”सत्ता में प्रभाष जी की “ब्राह्मण”सत्ता

“जन”सत्ता में प्रभाष जी की “ब्राह्मण”सत्ता

जनसत्ता के पहले संपादक प्रभाष जोशी को लगभग ढाई दशक पहले जब पत्रकारों की टीम बनाने का पहला मौका मिलता है तो कुछ ऐसी टीम बनती है। ये है जनसत्ता…

जिसकी जैसी मार्केटिंग, उसको वैसा वोट

जिसकी जैसी मार्केटिंग, उसको वैसा वोट

जनसत्ता में आज वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेष का लेख छपा है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले अरविंद पटना में लंबे समय तक पत्रकारिता कर चुके हैं और वो…

यह नई पत्रकारिता है जी

यह नई पत्रकारिता है जी

वर्तमान में मीडिया के दो चेहरे हैं। मुखौटा हटाने पर नज़र आने वाला असली चेहरा इतना विकृत है कि सिर शर्म से झुक जाता है। इस चुनाव में मीडिया ने…

चौकीदार का चोर होना

चौकीदार का चोर होना

((हिंदी के सबसे बड़े और सम्मानित पत्रकार प्रभाष जोशी हाल में संपन्न आम चुनावों के दौरान खबरों की खरीद-फऱोख्त के शर्मनाक धंधे के खिलाफ खम ठोककर मैदान में उतर पड़े…

ख़बरों के पैकेज का काला धंधा

ख़बरों के पैकेज का काला धंधा

ख़बरों का सौदा होता है। ये हम ही नहीं, हिंदी के सबसे बड़े पत्रकार प्रभाष जोशी भी कह रहे हैं। 10 मई को “जनसत्ता” में उन्होंने इस डरावने सच को…