ग्लोबल टेलीविजन ने विभाजनकारी भूमिका आरंभ कर दी है। तेलंगाना के सवाल पर जिस तरह का कवरेज आया है वह चिंता की बात है। उससे तीन सवाल पैदा हुए हैं।…
19 नवंबर को गन्ना किसानों ने सड़क से संसद तक अपना रोष ज़ाहिर किया। वे दिल्ली पहुंचे क्योंकि हमारी सरकार को ऊंचा सुनने की बीमारी हो गई है। उनका मकसद…
रविवार को देश के सभी बड़े अंग्रेजी अख़बारों में एक विज्ञापन छपा। यह विज्ञापन केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से जारी हुआ था। उसमें नक्सली हिंसा में मारे गए सात…
दो दिन पहले ख़बरें छपी कि पश्चिम बंगाल का लालगढ़ एक बार फिर लहू से लाल हो गया है। नक्सलवादियों और सीपीएम कैडर के बीच हुए संघर्ष में दस लोगों…
शनिवार को “हिंदुस्तान” पर नज़र डालने से लगा कि “स्वाइन फ्लू” का असर ख़त्म हो गया है। स्वाइन फ्लू ने भारत से पलायन कर लिया है। क्योंकि हिंदी-अंग्रेजी के तमाम…
“हिंदुस्तान” के कुछ फैसले चौंकाने वाले होते हैं। उन्हें “सामान्य समझ” रखने वाले पाठक नहीं समझ सकेंगे। जैसे मैं नहीं समझ पा रहा हूं। इसके लिए शायद कुछ “ज़्यादा ज्ञान”…
प्रणब मुखर्जी के बजट को मीडिया ने आड़े हाथों लिया है। कुछ अख़बारों ने बड़ी तीखी प्रतिक्रिया दी है। बजट की आलोचना में कुछ पत्रकार तो व्यक्तिगत हो गए हैं।…
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