प्रभाष जोशी के बनाए जनसत्ता को आज भी बदले हुए हालत में हम लोग निकाल रहे है। आलोचना करना बहुत आसान होता है और कुछ कर दिखाना बहुत मुश्किल। फिर…
अच्छा भैया, न्यास बन गया। भोजन, भजन और भाषण हो गये। न्यास को जो करना था वह करेगा या नहीं करेगा, यह पता नहीं। लेकिन जिस चीज से अपना कोई…
कमर झुकती गयी, ज्यों-ज्यों तनखा बढ़ी…. इब जाकर मिल्यो सही तत्त ज्ञान… लाल बुझक्कड़ ने मन ही मन सोच्चा…जे है असली बात… अपने बिचारे परभास जोसी जी चिंता करि-करि के…
एक जमाना था कि खद्दर के झोले में लोग धर्मयुग रखकर बड़े गुमान से चलते थे। लोगों को वह पत्रिका कुछ वैसे ही धर्म (यहां धर्म का मतलब कर्तव्य है)…
दिल्ली के प्रेस क्लब में एसपी सिंह को याद किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में पत्रकार जुटे। कुछ उनके दोस्त। कुछ उनके साथ काम कर चुके पत्रकार जो…
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